सुबह बिस्तरसे उठते बोलें
आओजी बाला मारे घेर आओजी , आओजी श्यामा मारे घेर आओजी ।
एकलडी परदेशमां मुने, मूकीने कां चाल्या ॥१
मुने हुति नींदलडी, तमे सुती मूकीने कां राते ।
जागीने जोऊ तां पियुजी ना पासे, पछीतो थासे प्रभाते ॥२
कलकलीने कहुं छुं तमने, आओजो आणे क्षणे ।
मारा मनना मनोरथ पूरन करजो, इन्द्रावती लागी चरणे ॥ ३
स्नानके समय
ऊठ के नहाइये जमुना जी में किजे सकल सिनगार ।
साथ सनमनधि मिलके खेलेन संग भरतार ॥
धाम तलाव कुन्ज वन जोहें, माणिक नहरें वनकी सोहे ।
पश्चिम चौगान बडोवन कहिये, पुखराज जमुनजी लहिये ॥
आठ सागर आठ जिमीके, येह पच्चीस पक्ष धामधनी के ॥
नूर नीर क्षीर दधि सागर, घृत मधु एक ठौर ।
रस सर्वरस सागर, बिना मोमिन न पावे कोई और ॥
श्री राजजी को प्रणाम करते समय
पथम लागुं दौ चरण को, धनी येह न छुडाओ छिन ।
लांक तले लाल एडियां, मेरे जीव को एही जीवन ॥
इन पाउं तले पडी रहुं, धनि नजर खोलो बातन ।
पल न वालुं निरखूं नेत्रेय, मेरे जीव के येहि जीवन ॥